भोपाल। मध्यप्रदेश की तबादला नीति के अंतिम दौर में सत्ता के गलियारों से एक बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पहले तबादलों की समय-सीमा बढ़ाने की मांग को सख्ती से ठुकरा दिया, लेकिन कुछ ही देर बाद एक मंत्री की दलील पर अपना फैसला बदलते हुए अतिरिक्त मोहलत देने की मंजूरी दे दी। इसके बाद देर रात तक प्रदेशभर में तबादला आदेशों की बाढ़ आ गई।
सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट बैठक में मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने तबादलों की समय-सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा। उनका तर्क था कि निर्धारित अवधि में बड़ी संख्या में प्रस्ताव लंबित रह गए हैं और कई मामलों में आदेश जारी नहीं हो पाए हैं। लेकिन मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में साफ कर दिया कि तय समय-सीमा अब आगे नहीं बढ़ेगी।
बैठक में उस समय नया मोड़ आया जब मंत्री इंदर सिंह परमार ने मामला मुख्यमंत्री के सामने अलग अंदाज में रखा। उन्होंने बताया कि अनेक तबादला प्रस्ताव विभागीय स्तर पर पहले ही स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन तकनीकी कारणों और पोर्टल पर अत्यधिक दबाव के चलते आदेश जारी नहीं हो सके। साथ ही कई फाइलों पर 16 जून की तारीख दर्ज होने का हवाला भी दिया गया।
सूत्रों का दावा है कि इंदर सिंह परमार की दलीलों को सुनने के बाद मुख्यमंत्री ने विशेष परिस्थितियों को देखते हुए राहत देने का निर्णय लिया और सीमित अवधि के लिए तबादलों की समय-सीमा बढ़ाने को हरी झंडी दे दी। मुख्यमंत्री की मंजूरी मिलते ही सामान्य प्रशासन विभाग हरकत में आया और देर रात तक लंबित फाइलों का निपटारा शुरू हो गया।
नतीजा यह रहा कि अंतिम घंटों में प्रदेशभर में हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादला आदेश जारी कर दिए गए। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में अब यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि जिस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री ने शुरुआत में खारिज कर दिया था, आखिर वही प्रस्ताव कुछ देर बाद कैसे मंजूर हो गया?
सत्ता के गलियारों में अब चर्चा इस बात की है कि आखिर ऐसा कौन-सा तर्क था जिसने मुख्यमंत्री का रुख बदल दिया और तबादलों की बंद होती खिड़की को आखिरी वक्त पर फिर खोल दिया।




