धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले दल गायब, आस्था के पर्व पर सूना पड़ा पूरा नगर
चौरई (छिंदवाड़ा)।
एक तरफ पूरा देश भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव रामनवमी पर भक्तिमय रंग में डूबा नजर आया…
तो दूसरी तरफ चौरई नगर की तस्वीर ने सबको चौंका दिया।
न कहीं भगवा झंडों की कतार…
न गलियों में तोरण द्वार…
न भक्ति के जयकारे…
मानो नगर को पता ही न हो कि आज कोई बड़ा धार्मिक पर्व है।

“चौरई में रामनवमी या आम दिन?”
नगर के प्रमुख चौक-चौराहों और बाजारों में दिनभर सामान्य गतिविधियां चलती रहीं।
जहां रामनवमी पर शहर की पहचान बदल जाती है, वहीं चौरई में सन्नाटा छाया रहा।
स्थानीय नागरिकों ने नाराजगी जताते हुए कहा—
“हर जगह पूरा शहर सजता है, और चौरई नगर में तो कुछ भी नजर नहीं आया… ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।”

राजनीति पर सीधा सवाल — “सिर्फ चुनाव तक धर्म?”
सबसे बड़ा सवाल अब राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों पर खड़ा हो रहा है।
👉 जो नेता चुनाव के समय धर्म और आस्था की बातें करते हैं…
👉 जो मंचों से संस्कृति बचाने के बड़े-बड़े वादे करते हैं…
वही रामनवमी जैसे बड़े पर्व पर पूरी तरह नदारद क्यों रहे?
क्या धर्म सिर्फ वोट बैंक का जरिया बनकर रह गया है?

“आस्था बनाम उदासीनता” — चौरई की बदलती तस्वीर
रामनवमी जैसे पर्व पर यह सूना माहौल केवल एक आयोजन की कमी नहीं…
बल्कि यह संकेत है कि कहीं न कहीं हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना कमजोर पड़ रही है।
चौरई की सड़कों पर छाया यह सन्नाटा अब सवाल बन चुका है—
👉 जिम्मेदार कौन?
👉 आस्था की जिम्मेदारी किसकी?
अब देखना होगा कि नेता और प्रशासन इस पर जवाब देते हैं…
या फिर चौरई में त्योहार सिर्फ कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएंगे।




